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लक्ष्य

Posted On: 7 Feb, 2018 कविता में

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मंज़िले कहती है – मैं तो मिल गया,
अब तो जश्न मनाओ |
लक्ष्य कहता है – तुम तो पड़ाव हो,
इतना मत इतराओ ||


रास्ते कहते है – थोड़ा सुस्ता तो लो,
मेरी खूबसूरती को निहार तो लो |
मैं कहती हूँ – मेरे लक्ष्य को तुमने देखा कहाँ,
जो आकर्षण उसमे हैं, वो तुममें कहाँ ?


पग के छाले कहते हैं,
इतने तो न निष्ठुर बन |
मन का विश्वास मुस्कुराता हैं,
‘इनकी’ तू थोड़ी और उपेक्षा कर ||


मार्ग की कठिनाइयाँ, ठोकरे,
जब चिढ़ाते हैं |
मन के जख्म उनको,
उनकी औकात बताते हैं ||

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